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शारदीय नवरात्र ‘कलश स्थापना विधि और मुहूर्त’

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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार किसी भी शुभ कार्य को करते समय कलश स्थापना जरुर करना चाहिए।कहते हैं कि शुभ कार्य में स्थापित कलश में सभी देवी-देवताओं,नवग्रह,समुद्र,नदियों का वास होता है।पूजा में स्थापित कलश को गणेश का स्वरुप माना गया है।इसीलिए कलश को विघ्न हरता माना गया है।
कलश स्थापना मुहूर्त
नौ दिन तक चलने वाली पूजा में मां दुर्गा के नौ स्वरुप की पूजा की जाती है।नवरात्र पूजा में कलश स्थापना का विधाना है।इसबार कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त 21 सितंबर गुरुवार को सुबह 6 बजकर 3 मिनट से लेकर 8 बजकर 22 मिनट तक है।वैसे नवरात्र में सभी समय शुभ माना जाता है लेकिन कोशिश करनी चाहिए की कलश स्थापना विशेष मुहूर्त में ही की जाए।किसी कारणवश सुबह के विशेष मुहूर्त में नहीं कर पाये हैं तो अभिजीत मुहूर्त में करें अच्छा रहेगा ।अभीजत मुहूर्त का समय 11 बजकर 36 मिनट से लेकर 12 बजकर 24 मिनट तक है।
कलश स्थापना विधि
सबसे पहले कलश के उपर रोली से ऊं और स्वास्तिक लिखें ।पूजा आरंभ करते समय ‘ऊं पुण्डरीकाक्षाय नम:’ मंत्र से स्वयं पर जल छिड़क कर शुद्धि करें। पूजा स्थान से पूर्व और दक्षिण दिशा में दीपक जलाएं।दीप जलाते समय ‘ऊं दीपो ज्योति: परब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दन: दीपो हरतु में पापं पूजा दीप नमोस्तु ते’ मंत्र का जाप करते रहें।मां दुर्गा की प्रतिमा के बाईं तरफ गणेश जी की प्रतिमा रखें।पूजा स्थान के उत्तर-पूर्व में पृथ्वी पर सात प्रकार के अनाज,नदी की रेत और जौ ‘ऊं भूम्यै: नम:’ मंत्र से रखें। कलश में जल, गंगाजल, लौंग,इलाइची, पान, सुपारी,रोली,चंदन,अक्षत,हल्दी,सिक्का,पुष्प डालें। ‘ऊं वरुणाय:नम:’मंत्र से कलश में गंगाजल भर दें।कलश में आम पल्लव(आम के पत्ते) डालें।कटोरे में कच्चा चावल या आटा भरकर कलश पर रखें।लाल रंग के कपड़े में नारियल को लपेटकर कलश पर रखें।कलश को माथे के पास लाते हुए वरुण देवता का ध्यान कर कलश को मिट्टी पर स्थापित करें।कलश स्थापित करने के बाद मां भगवती की अखंड ज्योत जलाएं।अखंड ज्योत नौ दिन तक लगातार जलने दें।ज्योत जलाने के बाद गणेश जी,वरुण देवता,विष्णु जी ,शिव जी ,नवग्रह की पूजा करें।हाथ में फूल लेकर संकल्प लें कि मां मै आज नवरात्र के प्रथम दिन से अभिष्ट कार्य के सफलता के लिए आपकी आराधना कर रही हूं/रहा हूं।मां आप मेरी पूजा स्वीकार करें।मेरी मनोकामना पूर्ण करें।यदि आपको मंत्र नहीं आता तो आप सिर्फ दुर्गासप्तशती के नर्वाण मंत्र से सभी पूजा सामग्री मां को अर्पित करें।मंत्र है ‘ऊं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे’।पूजा में यथा संभव सामग्री से ही आराधना करें।मां को श्रृंगार का सामान और नारियल अवश्य चढ़ाएं।कलश स्थापना कर मां दुर्गा की पूजा करें।पूजा में मां का आवाहन कर आसन दें।वस्त्र,श्रृंगार सामान,सिंदूर,हल्दी,अक्षत,फूल,मिठाई,दीप,फल से पूजा करें।पूजा के पश्चात आरती करें।पूजा के अंत में क्षमा प्रार्थना जरुर करें मां दुर्गा पूजा में कोई भूलचूक हुई है तो क्षमा करें।पूजा में स्टील या लोहे का कलश का उपयोग न करें

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